<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590</id><updated>2012-02-13T03:02:30.111-08:00</updated><category term='परदेस में बसा नया बसेरा'/><category term='कसक'/><category term='दंगे की कहानी एक घर की जुबानी'/><category term='बिखरे शब्द...'/><title type='text'>रमता जोगी बहता पानी....</title><subtitle type='html'>जिंदगी का एक ही मकसद है स्वच्छ, शीतल, स्वछंद नदी की तरह बहते जाना। बहते-बहते कई अवरोध बीच में आ जाते हैं, जिन्हें मेरी लहरें मिटा देने का माद्दा रखती हैं लेकिन कभी-कभी मन में कसक उठती है...बस उन्हें सहेजना चाहती हूँ...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>13</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-7275212069232347860</id><published>2010-05-09T00:33:00.000-07:00</published><updated>2010-05-09T00:45:53.326-07:00</updated><title type='text'>मदर्स डे के बहाने- माएँ आ गई हैं !</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/S-ZmbuKP8CI/AAAAAAAAAVY/IH1eamEnRxc/s1600/maa-1+041.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/S-ZmbuKP8CI/AAAAAAAAAVY/IH1eamEnRxc/s320/maa-1+041.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469171423921565730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मदर्स डे.......माँ के लिए निर्धारित एक दिन...मेरी माँ के लिए शुरू से ये दुकानदारी चलाने का दिन था। सासूँ माँ के लिए टीचर्स डे की ही तरह एक दिन जब उन्हें उनकी कुछ छात्राएँ ग्रीटिंग कार्ड देती थीं......और मेरे लिए? मैं उन बच्चों में से हूँ जिसने माँ बनने के बाद भी अपनी माँ या कहूँ कि माओं का आँचल नहीं छोड़ा। शादी के बाद एक की जगह दो माँए नसीब से मिल गईं। अब एक की जगह दो आँचल थे। मैं अपनी माँओं के बिना जिंदगी ही नहीं जी सकती। यहाँ न्यूजीलैंड में जब कोई साथी कहता है कि सही है तुम्हारें पिता और ससुर नहीं है तो तुम ही उनका सहारा हो तो हँसी आती है...मैं और माँओं का सहारा........मैंने तो आज भी उनके बिना चलना नहीं सीखा। बाहर लोगों को लगता है इंड़ीपेंडेंट हूँ वहीं मुझे लगता है मैं पूरी तरह से माँ पर डिपेंडेंट हूँ। इस बार जब दोनों माओँ को छोड़कर न्यूजीलैंड आना पड़ा तो मन बैठ गया था....माँ रूँधें कंठ से बोली थी जा अब बड़ी हो गई हैं, अब पल्लू पकड़ना छोड़ लेकिन मैं कहाँ छोड़ पाई। न्यूजीलैंड आते ही कवायद शुरू कर दी कि कैसे भी हो दोनों माँओं को न्यूजीलैंड बुलवा लूँ।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/S-Zn9CZaEII/AAAAAAAAAVo/r7y-VMVOQy0/s1600/maa-1+045.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/S-Zn9CZaEII/AAAAAAAAAVo/r7y-VMVOQy0/s320/maa-1+045.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469173095801163906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सासूँ माँ का पासपोर्ट बना हुआ था उनका झट वीजा हो जाता लेकिन माँ का तो पासपोर्ट नहीं बना था। फिर पता चला की एमए इतिहास की टॉपर माँ की वह मार्कशीट ही खो चुकी है जिसमें उनकी जन्म दिनांक दर्ज है। उपर से मैं उनसे सात समुंदर पार...कुछ करने में असमर्थ...एक लंबी कवायद के बाद माँ का पासपोर्ट बन पाया फिर उस पर वीजा का ठप्पा लगा....और छट दोनों माएँ सात समुंदर पार कर मेरे पास पहुँच गईं....और फिर आया मदर्स-डे। यहाँ विदेश में मदर्स डे...वो भी संडे के दिन। हम सब हल्की ठंड़ में रजाई ताने सो रहे थे ...इसी बीच दादी-नानी के कमरे से नन्हें आयुष की हँसने की आँवाजें आनी लगी औऱ कुछ ही पल में हँसता-खेलता आयुष मम्मा ऑख बंद  करों सरप्राइज कहता हुआ स्कूल में बनाया मदर्स डे कार्ड जो उसने बड़ी मुश्किल से मेरी नजर से छिपा कर रखा था मेरे सामने कर दिया औऱ बोला हैप्पी मदर्स डे मॉम। मैं मुस्कुरा दी और दोनों माँओं की ओर देखकर कहाँ देखों माँ बच्चू का मदर्स डे शुरू । आयुष ने कहाँ मम्मी दादी-नानी का मदर्स डे कब होगा। मैं कुछ बोलती उससे पहले ही नानी बोल उठी अरे कहाँ एक दिन से हम बूढ़ों का पेट भरेगा। हमारे लिए तो हर दिन मदर्स डे है। माँ के इन शब्दों ने कॉलेज की याद दिला दी जब पहली बार मदर्स डे का बुखार हम बहनों पर चढ़ा था और पापा ने कहाँ था बेटा ये पश्चिमी चोंचले हैं अपने देश में हर दिन मदर्स डे है। बस प्यार और सम्मान से माँ के आगे सिर झुका लो हो गया मदर्स डे पूरा। आज माँ के मुख से यह पंक्तियाँ सुनकर लगा कि झट से एकबार फिर माँ के आँचल में अपना सिर छिपा लूँ। &lt;br /&gt;  अगली पोस्ट में माएँ और न्यूजीलैंड में जमकर धमाल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-7275212069232347860?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/7275212069232347860/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=7275212069232347860' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/7275212069232347860'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/7275212069232347860'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मदर्स डे के बहाने- माएँ आ गई हैं !'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/S-ZmbuKP8CI/AAAAAAAAAVY/IH1eamEnRxc/s72-c/maa-1+041.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-6574499581476117731</id><published>2009-08-06T02:00:00.000-07:00</published><updated>2009-08-08T02:08:12.149-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परदेस में बसा नया बसेरा'/><title type='text'>बिन रोली हल्दी के साथ परदेस में बंधी राखी....</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/Sn1Aa2lqOYI/AAAAAAAAAQ8/M50yId3ARkw/s1600-h/new+photo-+vanganui+003.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/Sn1Aa2lqOYI/AAAAAAAAAQ8/M50yId3ARkw/s320/new+photo-+vanganui+003.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367517160969746818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;चार से पाँच माह बीत गए...लंबे समय से कम्प्यूटर से दूर पहले तो आँखों का ऑपरेशन...फिर बहन की शादी...इसके बाद परदेसी होना। मेरा ब्लॉग भी मेरी माँ की तरह तन्हा हो गया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन की आबोहवा के बाद भारत की गर्माहट और दो माँओं का दुलार....इसके बाद न्यूजीलैंड का सफर....घबराहट और कुछ माह के लिए माँओं से बिछुड़ने का डर मन में लिए मैं यहाँ आई थी। लेकिन सच कहूँ न्यूजीलैंड बेहद प्यारा लग रहा है। सबसे बड़ी बात है इस बार इंग्लैंड की राजधानी लंदन की तरह हम एनजेड की राजधानी वैलिंगटन में नहीं हैं। यहाँ हमारा बसेरा पामसटन नार्थ में है..शार्ट में पामी छोटा, प्यारा नैसर्गिक खूबरती से भरा शहर..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस शहर की हैरीटोंगा स्ट्रीट पर बने मकान नंबर 17 को घर बनाते-बनाते एक महीना कहा गुजर गया पता न चला...कलैंडर पर तारीखें बीतती गईं......सावन की रिमझिम झड़ी से दूर कड़कती सर्द सुबह में राखी की गर्माहट याद आई...ध्यान आया राखी तो कुछ दिनों की दूरी पर है...राजीव और आयुष राखी का इंतजार कर रहे थे....औऱ सच कहूँ इस बार इंतजार की इंतहा हो गई। रोज ये लैटर बाक्स देखते लेकिन राखी की पोस्ट नजर नहीं आती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहनों ने तो पंद्रह दिन पहले ही राखी पोस्ट कर दी थी। पता तो सही लिखा होगा न...जैसे कई सवाल जेहन में आते लेकिन उपर वाले की मेहरबानी देखिए...राखी के एक दिन पहले राखी के प्यार में गुथा गांधी जी के टिकिट से सजा लिफाफा पोस्ट में इतराता, इठलाता नजर आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशी से लिफाफा खोला तो देखा बहन के खत के साथ न्यूजीलैंड की सरकार का पत्र भी है....फिर क्या बहन के खत से पहले राजीव ने सरकारी फरमान पढना मुनासिब समझा। पत्र में बेहद इज्जत के साथ बताया गया था कि लिफाफे में कुछ सीड्स थे जिन्हें  सुरक्षा की दृष्टि से रोक लिया गया है। यदि हमें वे चाहिए तो बकायदा उनका टेस्ट करवाया जाए...( हेड्स ऑफ देम....इसे कहते है सुरक्षा। तभी इस देश में चोरी-चकारी और हमलों की वारदात लगभग शून्य है) । राजीव गफलत में फँस गए तब समझ में आया अक्षत और रोली रोक ली गई हैं।&lt;br /&gt;अगले दिन राखी की थाली सजाई गई अक्षत की जगह यहाँ के चावल रख लिए गए लेकिन रोली कहाँ से लाए। फिर राजीव ने ही दिमाग लगाया और हल्दी को रोली की जगह इस्तेमाल किया गया। शुक्र है विदेशियों को इंडियन करी पंसद आती है इसलिए हल्दी यहाँ के सुपर स्टोर में आसानी से मिल जाती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह एनजेड में हमारा पहला त्योहार  नेह के बंधन का त्योहार बिना बहन और बिना रोली के बाप-बेटे के प्यार में बीत गया...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-6574499581476117731?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/6574499581476117731/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=6574499581476117731' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/6574499581476117731'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/6574499581476117731'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='बिन रोली हल्दी के साथ परदेस में बंधी राखी....'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/Sn1Aa2lqOYI/AAAAAAAAAQ8/M50yId3ARkw/s72-c/new+photo-+vanganui+003.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-2080635988077685247</id><published>2009-01-11T21:58:00.000-08:00</published><updated>2009-01-11T22:59:04.091-08:00</updated><title type='text'>कभी-कभी खुद को पत्रकार मानने में शर्म आती है !</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWrg95xqJQI/AAAAAAAAAO8/47K5D-3wPUo/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 266px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWrg95xqJQI/AAAAAAAAAO8/47K5D-3wPUo/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5290288066385814786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आज&lt;/strong&gt; भी याद है सन 99 की वह सुबह जब एक ख्यात अखबार में उनके जर्नलिज्म स्कूल के खुलने की बात लिखी थी...पापा को बताया कि पत्रकारिता जैसा कुछ करना चाहती हूँ। यह बात सुनते ही माँ नाराज हो गईं। उनका मानना था कि पत्रकार केवल थैला लटकाकर यहाँ से वहाँ घूमते रहते हैं...फिर तुम गुटका चबाने-सिगरेट फूँकने वालो के बीच काम कैसे कर पाओगी। अगर सिविलसर्विसेज देने का मूड नहीं है तो लैक्चरार बन जाओ या फिर एमबीए बहुत से प्रोफेशनल्स कोर्सेस हैं....कुछ और कर लो। पापा ने कभी कुछ करने से रोका नहीं इसलिए उन्होंने हामी भर दी हारकर माँ ने भी हाँ कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब से लेकर अब तक हमेशा खुद को पत्रकार मानने में बेहद गर्व होता था। हमेशा लगता था कि हम कुछ नया कर सकते हैं। एक खबर जिसके असर से किसी का भला होता था तो लगता था कि जग जीत लिया। लेकिन अब पत्रकारिता में हो रही मारामारी से शर्म आती है। कारण हम सभी नियमकानून ताक में रख सिर्फ सर्क्यूलेशन या टीआरपी के चक्कर में फँस चुके हैं। महसूस होने लगा है कि हमें खबरों से कोई वास्ता ही नहीं रहा है। कभी न्यूज चैनल भूत-प्रेत, हत्याएँ, क्राइम की खबरें बेहद लाउड तरीके से दिखाकर टीआरपी गेन करने की कोशिश करते हैं .....इलेक्ट्रानिक मीडिया तो लगता है कि शैशवकाल में ही अपने रास्ते से भटक चुका है। उसे पता ही नहीं मंजिल क्या है बस बिना लगाम के घोड़े की तरह भागा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी गुरूवार रात एक न्यूज चैनल में चिल्लाचिल्लाकर एनकाउंटर के लाइव फुटेज दिखाए जा रहे थे। मेरी दोनों माओं ने भी वह चैनल चला रखा था। दोनों भोली माएँ समझ नहीं पाईं की उसी कमरे में खेल रहे चार साल आयुष के मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। हिंसक दृश्य सबसे पहले बच्चों को प्रभावित करते हैं और अपना शिकार बनाते हैं....इस कारण हमने अभी तक गजनी भी नहीं देखी है। मैंने तो चैनल बंद करवा दिया। आयुष भी पजल खेल रहे थे इसलिए शायद टीवी पर उनका ध्यान नहीं गया लेकिन आयुष के हमउम्र दोस्त ध्रुव के घर शायद पूरा एनकाउंटर देखा गया होगा। अगली सुबह स्कूल ऑटो का इंतजार करते हुए सभी बच्चे कॉलोनी में खेल रहे थे। तभी ध्रुव ने कहा आयुष तुम चोर मैं पुलिस अब मैं तुम्हें मारूँगा...तुम पहले तनी ( तीन साल की बच्ची ) के फोरहेड पर बंदूक लगाओं और ठीक न्यूज चैनल के अंदाज में दोनों खेलने लगे। मैं सन्न रह गई। क्या सस्ती सनसनी और टीआरपी के लिए इस खबर को दिखाना जरूरी था। ये सही है कि दर्शक अकसर कोतहूलता वश ऐसे प्रोग्राम देखेते हैं, मीडियाकर्मी बीचबचाव करते हुए बोलते ही कि दर्शक या पाठक ऐसे ही प्रोग्राम देखना चाहते हैं। लेकिन खुद को प्रबुद्धों की जमात में मानने वाले लोग आखिर कर क्या कर रहे हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जरा बच्चों का विजुवलाइजेशन जानिए-&lt;/strong&gt;मैंने ध्रुव से पूछा कि आप यह खेल क्यों खेल रहे हो? किसने सिखाया?&lt;br /&gt;ध्रुव- आँटी, टीवी पर देखा था...मम्मी के साथ।&lt;br /&gt;आप पुलिस ही क्यों बनना चाहते हो?&lt;br /&gt;ध्रुव- आंटी, चोर बनूँगा तो गोली लगेगी। फिर मुझे गिरना पड़ेगा। पेंट डर्टी हो जाएँगा, माँ डाँटेगी इसलिए पुलिस बनूँगा।&lt;br /&gt;मैंने तीनों को समझाया देखों ऐसे खेल नहीं खेलते......&lt;br /&gt;आयुष - मम्मा, आप भी तो टीवी में हो ना....टीवी अंकल ऐसा ही बताते हैं....अच्छा नहीं खेलूँगा मगर आप मुझे बैनटेन की घड़ी लाकर दो ( एक कार्टून सीरियल) फिर मैं बिग एनीमल बनकर फाइट करूँगा और गंदे लोगों को मारूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं ज्यादा समझाती उससे पहले ही उनका ऑटो आ गया......&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर आयुष को स्कूल भेजकर हमने रुख किया दफ्तर का और दो-चार होने लगे दिनभर की खबरों से देर रात पता चला की एक पिछड़ी बस्ती में दो युवकों ने एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश का खून कर दिया है। खबर ब्रेक कराकर कैमरापर्सन को खबर के लिए रवाना कर दिया गया। शनिवार ऑफिर पहुँचते ही देखा कि मध्यप्रदेश के लगभग हर चैनल पर एक व्यक्ति के आत्मदाह की कोशिश के लाइव फुटेज दिखाए जा रहे हैं। हर चैनल चिल्ला रहा था कि एक्सक्लूजिव फुटेज है। किसी मानसिक रुप से परेशान इंसान के इस बेवकूफीभरे कदम को दिखाने की क्या जरूरत। दिखाना है तो उसकी परेशानी दिखाएँ या फिर परेशानी को हल करने में मदद करें। अभी यह खबर दिमाग में कौंध ही रही थी कि एक चैनल के रिपोर्टर का फोन आया " पता चला क्या, कल के मर्डर के किसी के पास लाइव फुटेज हैं । मैं कोशिश कर रहा हूँ, तुम भी कुछ जुगाड़ लगाओ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" कुछ ही देर मैं गजब ब्रेकिंग हैं। कल रात हुए मर्डर का लाइव फुटेज है। उस बस्ती के कुछ लोग इस हत्याकांड में बीचबचाव की कोशिश कर रहे थे। तब किसी ने अपने मोबाइल पर पूरे हत्याकांड को कैद कर लिया" ....यह बात सारे खबरचियों तक पहुँच गईं.....हर एक में होड़ लग गई कि सबसे पहले कौन दिखाएँगा......ड्यूटी के तहत हमने भी एसाइनमेंट को खबर दी कि ऐसी कोई बात है। बस फिर क्या था असाइनमेंट के बंधुओं के फोन पर फोन घनघनाने लगे। कुछ ही देर में हमारे एक रिपोर्टर ने फुटेज जुगाड़ लिए। फिर एक फोन मैडम, फुटेज मिल गए सबसे पहले अपने चैनल पर ही चलेगें। मैं खबर लेकर सीधे आ रहा हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हमने फुटेज देखें...बेहद हीनियस......दो युवक एक अन्य युवक को तलवारों से घायल कर रहे हैं। कुछ लोग बीचबचाव की कोशिश कर रहे हैं। घायल युवक यहाँ-वहाँ भागकर जान बचाने की कोशिश कर रहा है। मैंने अपने असाइनमेंट पर फिर से फोन किया-  क्या यह खबर दिखाना चाहिए? जवाब आया- बिलुकल, सभी दिखाएँगें, टीआरपी का सवाल है। फिर क्या था पूरे फुटेज को कई बार दिखाया गया......इस खबर के बाद पूरी रात नींद नहीं आई। करवटे बदलते हुए सोचती रही कि क्या हम सचमुच पत्रकार हैं....सच कहूँ तो कभी-कभी खुद को आज के समय का पत्रकार मानने में शर्म आती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-2080635988077685247?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/2080635988077685247/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=2080635988077685247' title='32 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/2080635988077685247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/2080635988077685247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2009/01/blog-post_11.html' title='कभी-कभी खुद को पत्रकार मानने में शर्म आती है !'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWrg95xqJQI/AAAAAAAAAO8/47K5D-3wPUo/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>32</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-4846113973025996635</id><published>2009-01-09T03:49:00.002-08:00</published><updated>2009-01-09T04:07:46.537-08:00</updated><title type='text'>वैशाली की नगर वधू से लेकर फैशन फिल्म तक</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWc9K24B3sI/AAAAAAAAAOs/CwF9egP0JNo/s1600-h/spring-dance-111.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 319px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWc9K24B3sI/AAAAAAAAAOs/CwF9egP0JNo/s320/spring-dance-111.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5289263544108441282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;" &lt;strong&gt;   क्या मिलेगी नारी को अपनी ही देह से मुक्ति &lt;/strong&gt;"&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फिर &lt;/strong&gt;एक साल बदल गया......कलैंडर में 2008 की जगह अब 2009 चस्पा नजर आता है लेकिन क्या स्थितियाँ बदलेंगी। खासकर महिलाओं के लिए.....क्या उन्हे मुक्ति मिलेगी अपने ही देह के जाल से। क्या उन्हें सुंदर देह की कठपुतली और भोग्या से बढ़कर कुछ और भी माना जाएगा। इस बार नए साल की शुरूआत नानी के गाँव से की। कुछ दिनों की छुट्टी लेकर पहले ददिहाल जबलपुर गई उसके पास ही एक गाँव है फुलारा.......वहाँ मेरा प्यारा ननिहाल है। यह गाँव काफी छोटा और शोर-शराबे से दूर लगता था लेकिन बीते पाँच सालों ने गाँव की रंगत बदल दी है. अब गाँव के कच्चे घरों की छप्पर पर भी डिश टीवी तैनात दिखता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामा ने भी हमारी छत पर उसे लटका रखा है लेकिन बिजली विभाग की दया से वहाँ दस से बारह घंटे की बिजली नदारत थी सो गाँव का सुकून महसूस हुआ। बुद्धू बक्से के मुँह पर ताले जड़े रहे। कड़ाके की ठंड थी सो बचपन की तरह पंखे की कमी भी नहीं खली। बल्कि दीनदुनिया से दूर नानी का घर साथ में चिपके खेत अजीब सा सुकून दे रहे थे। इसी सुकून के बीच धूप सेंकते हुए तुरंत तोड़ी हुई गदराई बिही (अमरूद) का स्वाद उठाते हुए नाना जी की लाइब्रेरी की याद आई। आनन-फानन में लकड़ी की अटारी(एक कमरे का नाम) पर जाकर नाना की लाइब्रेरी खंगालने लगी। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से पढ़े मेरे नाना को पढ़ने का खासा शौक था..उन्हीं के साथ मैंने अपनी जिंदगी का सबसे पहला हिंदी का उपन्यास चंद्रकांता संतती पढ़ा था। हाई स्कूल में शिवानी से परिचय भी गाँव में ही हुआ। आचार्य रजनीश से लेकर विवेकानंद तक मैंने कई उपन्यास और किताबे नाना की लाइब्रेरी से निकाल कर पढ़े.....लेकिन जाने क्या बात थी कि आचार्य चतुर्सेन के उपन्यास वैशाली की नगरवधू को नाना ने पढ़ने न दिया। तब मैं हाईस्कूल में थी जब नाना ने मेरे हाथों से छीनकर उस उपन्यास को अटारी पर रख दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद कई बार रेलवे स्टेशन पर मुझे यह किताब नजर आईं लेकिन जिद्द थी जो नाना पढ़ सकते हैं मैं क्यों नहीं । मैं तो नाना से लेकर ही पढ़ूगी........आज जब नाना नहीं थे तब उनकी लाइब्रेरी में ये किताब बड़ी जतन से रखी दिखाई दी। नानी से प्यार से कहा- आखरी बखत में तेरे नाना किताबें संभाल रहे थे ....जिल्द चढ़ा रहे थे ....कह रहे थे मोनू आए तो दे देना बाकि सब को तो हैरी पॉटर से ही प्यार है। कौन पढ़ेगा इन्हें। लाइब्रेरी में सबसे आगे रखे उपन्यास को महसूस हुआ "नानू खुद कह रहे थे अब नहीं रोकूँगा जा पढ़ ले।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर क्या था ..गुनगुनी धूप में नाना की आरामकुर्सी रखी और रात तक उपन्यास से ही चिपकी रही.। जब तक नानी की मीठी डाँट "अरी बिटुरी तनिक हमारे पास भी बैठ जा कल तो जाना है कि रट शुरू कर देगी ".के बाद याद आया कि रात हो चुकी है। खाना खाकर बिजली विभाग को जमकर कोसा। नानी से तनिक देर बतियाने के बाद अंधेरे में चिमनी जलाकर किताब जारी रही। अगले दिन सुबह इनोवा के सफर में भी अम्बपाली मेरी हमसफर बनी........रस्ता कैसे कट गया पता नहीं चला......अम्बपाली एक मासूम बच्ची जिसकी मासूम इच्छाएँ थीं से लेकर एक खूबसूरत देह की युवती एक गौरवमयी युवती जिसे जबरदस्ती नगरवधू बनाया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद जब वह साध्वी बनी तब भी बौद्धों ने भी कहा कि " अब नारी ने बौद्ध धर्म में प्रवेश ले लिया है यह न बचेगा" अर्थात बुद्ध और उनके अनुयायी भी मानते थे कि आम व्यक्ति संत बनने के बाद भी नारी को देह ही मानेगा। नारी के देह की गमक सन्यासी के ब्रह्मचर्य को तोड़ सकती है। इसी उपन्यास में एक और किरदार था कुडली विषकन्या अपनी सुंदर देह का भार ढ़ोती एक और स्त्री। अम्बपाली के बारे में जितना सोचती मन कड़वा होता जाता। महसूस होता कि यह किरदार यदि वास्तव में जीवित होता तो अपनी देहभार के नीचे दबी यह गरिमामयी महिला शायद हर रात एक नई मौत मरता। शाम होते-होते हम जबलपुर पहुँच गए। बहनों ने बड़े चाँव से फैशन लगाई। अपनी कमाई से खरीदें एलसीडी टीवी का रिज्योलूशन दिखाने का उत्साह था...इसी उत्साह में माँ और मैं अपनी थकान भूल गर्म रजाई में घुस फिल्म देखने लगे.........लेकिन जैसे-जैसे प्रियंका चौपड़ा, कंगना रणावत का किरदार आकार लेता जा रहा था वैसे-वैसे मुझे उस किरदार में अम्बपाली नजर आने लगी। लगा हर एक के दिमाग में नारी की देह ही कसमसा रही है। हर जगह जहाँ दिमाग और विद्वत्ता की बात आती है और महिला भारी नजर आती है तो उसके इस दिमाग को उसी की देह के नीचे कुचलने की कोशिशे की जाती हैं। आखिर क्यों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इस नए साल में नारी को स्वयं उसकी देह से मुक्ति मिल पाएँगी। हमें एक संपूर्ण व्यक्तित्व की तरह सराहा जाएगा। या फिर कोमल भावनाओं की पूँजी नारी भी पुरष की तरह देह को प्रमुखता देने लगेगी.......या देने लगी है तभी तो संजय दत्त, सलमान खान, जॉन अब्राहम के बाद शाहरूख खान और आमिर खान भी अपनी सिक्स और एट पैक देह का प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं......इस साल क्या होगा। मैं तो चाहती हूँ नारी को अपनी ही देह से मुक्ति मिल जाएँ और वो ऊँचे आकाश में उड़े लेकिन यह उड़ान विचारों की हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-4846113973025996635?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/4846113973025996635/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=4846113973025996635' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/4846113973025996635'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/4846113973025996635'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2009/01/blog-post_2457.html' title='वैशाली की नगर वधू से लेकर फैशन फिल्म तक'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SWc9K24B3sI/AAAAAAAAAOs/CwF9egP0JNo/s72-c/spring-dance-111.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-846742850150075150</id><published>2008-12-20T02:10:00.000-08:00</published><updated>2008-12-20T02:13:25.070-08:00</updated><title type='text'>कुछ अहसास...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUzEzcQml8I/AAAAAAAAAMY/3p1-SahCZNU/s1600-h/pearl1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 242px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUzEzcQml8I/AAAAAAAAAMY/3p1-SahCZNU/s320/pearl1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5281812851036952514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;" कुछ अहसास ओस की बूंदो के जैसे&lt;br /&gt;करते है रुह को ताजा ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अहसास ठंडी हवा की तरह&lt;br /&gt;देते हैं मन की अगन को सुकून...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अहसास भीगे होठों की तरह&lt;br /&gt;भरते हैं बंजर जमी में नमी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अहसास प्रेम की बूँदों के जैसे&lt;br /&gt;आंखों से बहने से पहले संभल जाते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिर के जमी पर होगी उनकी रुसवाई&lt;br /&gt;इसलिए आँखों में इन मोतियों को छुपा लेती हूँ।।" &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(&lt;em&gt;इन अहसासों को मन के कंदराओं में कहीं छिपा कर रखा है..लेकिन लाख छिपाने के बाद भी ये अहसास मेरे चेहरे की मुस्कुराहट में झलक जाते हैं...) &lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-846742850150075150?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/846742850150075150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=846742850150075150' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/846742850150075150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/846742850150075150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/12/blog-post_20.html' title='कुछ अहसास...'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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भयावह रुदन के बीच रोज मरती आत्मा। सपनों में, हकीकत में खुद को धिक्कारती...बार-बार अहसास दिलाती कि आत्मसम्मान के बिना जिए जाने वाली जिंदगी मौत से बत्तर है। आईना देखने का मन न होता..देख लो तो नजरे खुद अपना चेहरा निहारने से मना कर देती....सिर से पाँव तक आहत और शर्मिंदा वजूद.......( बगदाद के हर युवा की यही कहानी है) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवा पत्रकार मुंतजर-अल-जैदी द्वारा बुश पर जूता फेंकने की घटना ने एक बार फिर बगदाद के रिसते घाव को दुनिया के सामने ला दिया है। मैं बगदाद में सद्दाम की तानाशाही को जायज नहीं ठहराती...लेकिन बुश के हाथों चल रही अमेरिकी सत्ता ने जो किया क्या वो जायज था ? अमरिकी सरकार का आरोप था कि बगदाद में जैविक हथियार हैं। यह अलग बात है कि अभी तक अमेरिका को जैविक हथियारों के जखीरे के नाम पर कुछ नहीं मिला। तेल के कुओं पर आधिपत्य की तानाशाही सोच ने एक मुल्क को बरबाद कर दिया। बुश पर जूते फेंकने वाले मुंतजर-अल-जैदी ने अपनी जान की परवाह किए बिना बगदाद के युवाओं की भावनाएँ व्यक्त कर दीं- उसने कहा " जूते इराक की विधवाओं और अनाथों की ओर से है " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; " किसी की आत्मा पर निशाना साधना हो तो उसे गोली नहीं जूते मारो। "&lt;/strong&gt; शायद यह युवा पत्रकार भी पूरे देश की बेज्जती का बदला लेना चाहता था। शायद उसकी छटपटाती आत्मा बुश की बेज्जती करके अपने राष्ट्र की बेज्जती का बदला लेना चाहती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँख बंद करके एक ऐसे देश की कल्पना करके देखिए जिसके सीने पर दूसरे मुल्क की फौजें कदमताल कर रही हों...जहाँ आतंक का तांडव चल रहा हो। सद्दाम की तानाशाही को खत्म करने के लिए अमेरिका ने एक पूरे राष्ट्र को ही नेस्तोनाबूत कर डाला। जो लोग जिंदगी जी रहे थे वे अब घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर हो गए। अब अमेरिका यदि इस मुल्क पर से अपना आधिप्तय समाप्त करने की घोषणा भी कर दे ( सच तो यह है कि आर्थिक मंदी से उबरने के लिए सेना को हटाया जाना आज महाशक्ति की मजबूरी है) तब भी बगदाद ने जो खोया है वह उसे कोई वापस नहीं लौटा सकता। बगदाद की महिलाओं और बच्चों का करूण रूदन हर बगदादी को मौत से बत्तर जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगदाद का यही गुस्सा युवा पत्रकार के जूते में दिखाई देता है जैसे जूता खुद चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा हो-  " बुश साहब बेज्जती के जो सपने हम बगदादियों को चैन की नींद सोने नहीं देते मेरे रूप में ऐसे ही सपने तुम्हें भी मुबारक हो " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और सच में महाशक्ति के मुँह पर पड़ा यह जूता भले ही अपना निशाना चूक गया हो लेकिन मुंतजर के जूते के रूप में बगदाद के आक्रोश का निशाना सही जगह लगा है। बिना आवाज की यह मार महाशक्ति को हमेशा बताती रहेगी कि &lt;strong&gt;" तुम्हारी इज्जत की ही तरह हमारी और हमारे राष्ट्र की इज्जत भी अमूल्य है। " &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-108789237050272326?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/108789237050272326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=108789237050272326' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/108789237050272326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/108789237050272326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/12/blog-post_8648.html' title='महाशक्ति को जूता !'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUdN199PHfI/AAAAAAAAAL0/TVbOQOLvCVM/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-1258166514930961586</id><published>2008-12-15T01:50:00.000-08:00</published><updated>2008-12-15T01:52:34.931-08:00</updated><title type='text'>नारी सिर्फ देह नहीं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUYo2C3n0uI/AAAAAAAAALk/CbYJXK0i7LU/s1600-h/WOMEN.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 254px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUYo2C3n0uI/AAAAAAAAALk/CbYJXK0i7LU/s320/WOMEN.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5279952522086699746" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कल रात चैनल सर्फ करते हुए निगाहें कलर्स पर टिक गईं। डॉसिंग क्वीन करके एक और रियलिटी शो आ रहा था...कजिन जिद्द करने लगी। दीदी न्यूज छोड़ों, दिन भर सीरियल चलता रहा...फिर न्यूज अब तो कुछ लाइट देखने दो। पुराने दिनों की तरह कजिन के साथ मस्ती करने लगी....एकाएक मैंटोर का डाँस खत्म हो उनकी स्टूडेंट्स बनने वाली लड़कियों के नाम सामने आना शुरू हुए और यह क्या...पहली बार किसी डॉस शो में बीयरबाला सामने आई....मैरी पुतलियाँ फैलने लगी। बारबाला का स्टेज तक पहुँचना बेहद सुखद लगा...बारबाला बनने के पीछे की मजबूरी ने कोर भिगा दी लेकिन बार बाला से ज्यादा अभिभूत हुई भूमिका से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफेद दाग (ल्यूकोडर्मा) से जूझ रही भूमि...जिसे अपनो ने जलाया था...फिर इंजेक्शन के रिएक्शन से आधे शरीर पर सफेद दाग हो गए....भूमि अपनी दास्तां सुना रही थी। दर्शकों को अपने सफेद दाग दिखाने के बाद भूमिका प्रापर मेकअप में सामने आई। पूरे आत्मविश्वास से नृत्य किया...हेमा मालिनी, जीतेंद्र जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ सभी ने खड़े होकर उसका अभिवादन किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज मैं इसी आत्मविश्वासी लड़की के नजरिए से कहना चाहती हूँ नारी सिर्फ देह नहीं....पुरूष किसी भी देश-काल और युग में नारी को उसकी देह से इतर नहीं देखता। भूमिका की बदरंग देह पुरूष को आकर्षित नहीं करती...लेकिन उसका आत्मविश्वास अच्छे-अच्छे पुरूषों का मान हिलाने के लिए काफी है। भूमिका की बदरंग देह में आत्मविश्वास का खूबसूरत रंग भरा है उसकी माँ ने ...जो अपनी बेटी को कहती है वो खूबसूरत है । उसकी आधी फिरंग है और एक बदसूरत लड़की में आत्मविश्वास के बीज बोती रहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आस-पास के माहौल में देखा है लड़की सुंदर है तो माँ-पिता को शादी की चिंता नहीं। पति अपनी खूबसूरत पत्नि पर इतराता है। वहीं नारी अपनी देह की खूबसूरती को गलत नजरों से बचाती नजर आती है। इन विशलेषणों का अर्थ यह है कि आसपास का माहौल ही उसे समझा देता है कि वह लड़की है, एक खूबसूरत शरीर...लेकिन क्या नारी सिर्फ देह है? उसकी आत्मा नहीं। अभी चोखेर बाली पर "मुझे चाँद चाहिए" फिर घूघूती बासूती जी के ब्लाग पर "इन्हें चाँद चाहिए&gt;" पर खासा विचारविमर्श हुआ। पक्ष-विपक्ष में कई बातें रखी गई। यह विषय किसी भी आगे बढ़ रही नारी को झकझोर देता है क्योंकि नारी को देह से इतर देखा नहीं जाता। हर नारी की तरक्की को उसकी देह से जोड़ दिया जाता है। वह पुरूषों से ज्यादा काम करें...चौबीस घंटे सिर्फ काम करती रहे...उस पर तरक्की करे तो भी कहीं खुले स्वरों में तो कहीं दबे छिपे इस तरक्की को देह से जोड़ दिया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब हमें सोच के अपने दायरे बदलने होंगे...नारी सिर्फ देह नहीं है। शरीर से इतर उसका दिमाग है, भावनाएँ हैं सबसे बढ़कर कुछ कर दिखाने का माद्दा है। उसके इस माद्दे की इज्जत करनी होगी और सबसे पहले इस सोच को हम स्त्रियों को ही बदलना होगा। अपनी बच्चियों को बताना होगा कि वे कमनीय देह से इतर भी कुछ हैं। नारी सिर्फ देह नहीं है उसका अपना वजूद है, अस्तित्व है। जिसकी उसे इज्जत करनी होगी और दूसरों से करवानी भी होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-1258166514930961586?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/1258166514930961586/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=1258166514930961586' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/1258166514930961586'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/1258166514930961586'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html' title='नारी सिर्फ देह नहीं...'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SUYo2C3n0uI/AAAAAAAAALk/CbYJXK0i7LU/s72-c/WOMEN.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-1318872130480247249</id><published>2008-12-06T21:40:00.000-08:00</published><updated>2008-12-06T22:16:04.168-08:00</updated><title type='text'>मोशे तुमसे मैं क्या कहूँ.......</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtiFj3WmZI/AAAAAAAAAH0/Jo4c-ZB509k/s1600-h/ayush.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5276919236060944786" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 344px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtiFj3WmZI/AAAAAAAAAH0/Jo4c-ZB509k/s320/ayush.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class=""&gt;"मम्मी&lt;/span&gt; तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई? प्लीज, जल्दी वापस आ जाओ.........वरना मैं भी तुमकों छोड़कर चला जाऊँगा।"&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;प्यार, मुनहार और धमकी मिले यह वाक्य मेरे नन्हें उस्ताद के हैं.......मेरे बेटे के। चौथे वसंत में कदम रखने के लिए उतावले हो रहे आयुष के वाक्यांश भी उनकी ही तरह तेजी से बड़े हो रहे हैं। अब उन्हें समझ में आने लगा है कि मम्मी ऑफिस के काम से बाहर जाती हैं और मम्मी का खुद से दूर होना उसे बिलकुल पसंद नहीं...इसलिए वे इस बात को जताने से कभी चूकते नहीं...। जब भी वे मुझे ऐसी धमकी देते हैं मैं उन्हें मनाती हूँ, समझाती हूँ माँ को काम है । बस अभी आती हूँ...चिंता मत करो। देर रात हो जाए तो दिलासा देती हूँ, आँखे बंद करो- जब खोलोगे मैं तुम्हारे सामने रहूँगीं.......लेकिन मोशे मैं तुमसे क्या कहूँ? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;आप सोच रहे होंगे मोशे के जिक्र में आयुष की चर्चा क्यों? इसलिए कि पिछले एक हफ्ते से मुझे आयुष में मोशे और मोशे में आयुष नजर आ रहे हैं। अभी कुछ दिन ही तो हुए हैं...रोता हुआ मोशे या हर गम से अनिभिज्ञ मुस्कुराता हुआ मोशे नरीमन हाऊस में घटे हादसे का चेहरा बन चुका है। हर चैनल मोशे के बहाने मुंबई का दर्द दिखा रहा है, उस रात भी चैनलों पर नन्हा मोशे छाया था। मैं आयुष को खाना खिला रही थी कि मोशे की गमगीन मुद्रा को टीवी पर देख आयुष बोल उठा ...मम्मी देखो, बेबी रो रहा है। फिर खुद से ही प्रश्न किया...बेबी क्यों रो रहा है। नादान ने तुरंत प्रतिउत्तर भी दे दिया...इसकी मम्मी ऑफिस गई होगी! &lt;/p&gt;&lt;div&gt;आयुष ने तो नादानी में कह दिया मम्मी ऑफिस गई होगी? शायद मन ही मन तसल्ली भी कर ली होगी कि उसकी मम्मी की ही तरह मोशे की मम्मी भी ऑफिस से वापस आ जाएगी और रोते मोशे को चुपा लेगी लेकिन ..... &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtibKZEvZI/AAAAAAAAAH8/vadn3NXaIdI/s1600-h/moshi_photo_.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5276919607180180882" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 208px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtibKZEvZI/AAAAAAAAAH8/vadn3NXaIdI/s320/moshi_photo_.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आज मोशे दर्द का एक चेहरा है " मुस्कुराता चेहरा।" कितनी प्यारी और दिलकश है उसकी मुस्कान लेकिन ये मुस्कुराहट याद दिलाती है हैवानियत को। जिसने एक मासूम से उसके जन्मदिन के दिन ही माँ का साया छीन लिया। मोशे के अंतहीन रुदन के बाद आयुष मुझे मम्मा या मम्मी कहता है तो दिल में कसक उठती हैं। नन्हें मोशे की गुलाबी अंगुलियाँ भी तो माँ का आँचल ढ़ूढती होगीं। अकसर ऑफिस से लौटते हुए आयुष के लिए गुब्बारा या गेंद खरीदती हूँ...हरी, पीली, नीली खासकर लाल। बच्चों को चटख लाल रंग बेहद पसंद है। अफसोस! खून का रंग भी लाल ही होता है। मोशे का पजामा भी अपनो के दर्द से लाल ही हुआ था। &lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;तस्वीरों में मोशे के हाथों में भी गेंद देखी थी, गेंद का नारंगी रंग भी उसके रोते चेहरे के सामने लाल नजर आ रहा था। प्रार्थनाघर में हाथ में गुब्बारा था। हे भगवान! उसका रंग सचमुच लाल ही था...तब से लेकर अब तक आयुष के लिए गुब्बारा या गेंद खरीदने का साहस नहीं जुटा पाई। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;p&gt;मुंबई के हादसे के बाद मेरे अंदर की माँ को अजीब सा डर सताता है। उन भयावह रातों के बाद अब अकसर रात को उठकर आयुष का चेहरा निहारती हूँ। डर लगता है...नींद मैं भी मुझे पहचान जाने वाले आयुष क्या मेरे बिना जी सकेगें। यह कल्पना ही डरा जाती है। मैं एक माँ हूँ , मोशे के लिए कुछ लिखना चाहती हूँ लेकिन कलम और दिमाग साथ छोड़ देते हैं.....आँखे झलक जाती हैं...बस इतना ही कह सकती हूँ कि &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtj91UtqVI/AAAAAAAAAIE/v9zLVAW1LQI/s1600-h/moshe_1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5276921302331795794" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 237px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtj91UtqVI/AAAAAAAAAIE/v9zLVAW1LQI/s320/moshe_1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; "मासूम मोशे &lt;span class=""&gt;तुझे&lt;/span&gt; मैं क्या कहूँ? तुझमें मुझे मेरा मासूम दिखता है। जन्नत में बैठी तुम्हारी माँ की आँखों में आसुओं का दरिया होगा। अपनी माँ की आँख के तारे हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया की हर माँ की आँखे नम है। तुम्हारी मासूम मुस्कुराहट के लिए कर रहीं हैं दुआ.....और मुझे विश्वास है कि टीवी पर तुम्हारा कभी रोता कभी मुस्कुराता चेहरा देखकर उस माँ की भी आँखें भीगी होंगी जिसकी कोख से जन्में हैवान ने तुम्हें तुम्हारी माँ से दूर किया है......"&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;strong&gt;भगवान तुम्हें तुम्हारी महान आया के आँचल में हमेशा यूँ ही मुस्कुराता रखें जैसा तुम मुझे हिंदुस्तान छोड़ते समय टीवी पर दिखाई दिये थे।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;strong&gt;आमीन...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-1318872130480247249?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/1318872130480247249/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=1318872130480247249' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/1318872130480247249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/1318872130480247249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='मोशे तुमसे मैं क्या कहूँ.......'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STtiFj3WmZI/AAAAAAAAAH0/Jo4c-ZB509k/s72-c/ayush.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-698323850570370563</id><published>2008-11-30T07:06:00.000-08:00</published><updated>2008-11-30T22:58:42.397-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिखरे शब्द...'/><title type='text'>रात अभी बाकी है.....</title><content type='html'>गहन अंधेरा है&lt;br /&gt;उजास नजर आता नहीं&lt;br /&gt;हर तरफ कुहासा है&lt;br /&gt;क्योंकि रात अभी बाकी है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताज पर फिर फहरा गया तिरंगा&lt;br /&gt;लेकिन जमीं पर बिखरा खून अभी बाकी है&lt;br /&gt;शर्मिंदा है जमीर, माँ की नहीं कर पाया रक्षा&lt;br /&gt;हर सिर है झुका क्योंकि रात अभी बाकी है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उजाले के लग रहे हैं कयास&lt;br /&gt;पर भूलों मत रात अभी बाकी है&lt;br /&gt;गुस्से से भिच रही हैं मुट्ठियाँ&lt;br /&gt;चढ़ रही हैं त्योरियाँ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों की मासूम मुस्कुराहट के बीच&lt;br /&gt;माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें बाकी हैं&lt;br /&gt;उठो खड़े हो और लड़ों क्योंकि रात अभी बाकी है&lt;br /&gt;रोशनी की चंद किरणों को समेटों और हुंकार भरो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ के सपूतों उठों, दानवों से लड़ों&lt;br /&gt;रुदन और क्रंदन के बीच कहो&lt;br /&gt;हमने हार नहीं मानी है इसलिए कहते हैं कि&lt;br /&gt;रात अभी बाकी है &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffff66;"&gt;लेकिन भोर होने वाली है ।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(किसी ने कहा, कानों ने सुना, न जाने क्या हुआ...बस मन किया और की बोर्ड पर अंगुलियाँ चल गईं&lt;br /&gt;और एक कच्ची-पक्की कविता या कहें काफिया लेकिन सच्ची भावनाएँ आकार ले गई। मनोभाव कुछ मासूमों के हैं जिनमें बहुत कांट-छांट करना मुझे गवारा नहीं लगा। )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-698323850570370563?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/698323850570370563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=698323850570370563' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/698323850570370563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/698323850570370563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/11/blog-post_30.html' title='रात अभी बाकी है.....'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-4042384979765026399</id><published>2008-11-29T00:13:00.000-08:00</published><updated>2008-11-29T00:22:26.148-08:00</updated><title type='text'>एक पाती भईया राज के नाम...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STD7oFnA0tI/AAAAAAAAAHU/P1zz9_qb-Hw/s1600-h/Raj-Thackeray%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5273991829769999058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STD7oFnA0tI/AAAAAAAAAHU/P1zz9_qb-Hw/s320/Raj-Thackeray%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;  &lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;राज ठाकरे जी कदाचित नाराज होंगे....मैंने उन्हें उत्तर भारतियों की तरह भईया जो कह दिया। क्या करूँ, रहती मध्यप्रदेश में हूँ लेकिन दोस्त पूरे देश में फैले हैं...तो भईया राज आप कौन सी कुंभकर्णी नींद में सोए हो। मुंबई जल रही है लेकिन आप नजर नहीं आए। क्यों घर में दुबके रहे। हम इंदौर में रहते हैं। हमारे इंदौर को माँ अहिल्या के नाम से जाना जाता है इसकी पहचान इंदूर के रूप में थी। यदि आप यहाँ होते तो मिनी मुंबई कहलाने वाले इंदौर की तरक्की की जगह इंदौर को इंदूर बनाने में तुले रहते। हमारे धर्मनिरपेक्ष कुटुंब में सासू माँ महाराष्ट्रियन हैं...वे आपसे खासी खफा हैं। वे हमेशा कहती हैं आप देश बाँट रहे हैं...जहाँ चार बर्तन हो खटकते हैं लेकिन बर्तन बाहर फेंक दिए जाएँ तो रसोई कैसे बनेगी। हमारे परिचितों के घर होने वाली महाराष्ट्रियन संगोष्ठी में भी आपको आपकी नीतियों को कोसा जाता है। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;कल ऐसी ही एक संगोष्टी हमारे घर में थी जिसमें मुंबई में शहीद सभी देशभक्तों को श्रद्धांजली दी गई। श्रद्धांजली में 85 वर्षीय बुजुर्ग दंपत्ति जिन्हें हम प्यार से आत्या और आतोबा भी शामिल थे। हम तो कुछ ही देर के लिए वहाँ जा सके लेकिन जो देखा-सुना वो आप तक पहुँचा रहे हैं। आतोबा अपने धीमें स्वरों में बड़बड़ा ( आप जैसे नौजवान यही कहेंगे) रहे थे '' अरे, राज ठाकरे कहाँ हैं, उसे नींद से जगाओं। मुंबई से उत्तर भारतियों को निकालने में, बेकसूर छात्रों की पिटाई करने में तो बेहद आगे थे। लेकिन अब जब आमची मुंबई के सम्मान पर हमला किया जा रहा है तब वे कहाँ छिपे हैं। ठीक है, आतंकियों से मुकाबला नहीं कर सकते लेकिन बाहर से ही सही कम से कम सेना के जवानों और कमांडों को भोजन-पानी ही पहुँचा देते। सड़क पर निकलकर मुंबई वासियों को विश्वास ही दिला देते कि मुसीबत के समय में उनका नेता उनके साथ हैं।'' &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;वहीं आत्या आशा मोघे जो खुद रिटायर्ड प्रिसंपल रही हैं ठेठ मराठी में बोली मैं हिंदी मे अनुवाद लिख रही हूँ '' यदि मेरा राज जैसा बेटा होता तो अहिल्या माँ की तरह हाथी के पाँव के नीचे कुचलवा देती। नाकारा आज मुंबई को उसकी जरूरत है। वो ये क्यों भूल रहा है कि आज मुंबई की रक्षा सेना कर रही है। जिसमें हर धर्म के लोग हैं। शहीद होने वाले जाँबाजों में भी हर धर्म के लोग हैं'' , तो भईया राज अब आप बताओं आपके पास हमारे आत्या-आतोबा के सवालों के कुछ जवाब है।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;हम तो यहीं कहेंगे कि यह हादसा आपको सबक सिखा जाएँ। आप हमारे भारत को बाँटने का काम छोड़े और अब उत्तरभारतियों नहीं बल्कि आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम छेडे़..मानती हूँ आप जैसे राजनीतिज्ञ से उम्मीद ज्यादा कर रही हूँ लेकिन जानती हूँ उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-4042384979765026399?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/4042384979765026399/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=4042384979765026399' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/4042384979765026399'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/4042384979765026399'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/11/blog-post_29.html' title='एक पाती भईया राज के नाम...'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/STD7oFnA0tI/AAAAAAAAAHU/P1zz9_qb-Hw/s72-c/Raj-Thackeray%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-8132654247233707438</id><published>2008-11-27T02:34:00.000-08:00</published><updated>2008-11-28T00:59:09.295-08:00</updated><title type='text'>आतंक के दानव का सिर कुचल दो</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SS6xsvVk8vI/AAAAAAAAAHM/6yVC-i5lYsA/s1600-h/HomeIndex2708%5B1%5D.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5273347595876758258" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 310px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SS6xsvVk8vI/AAAAAAAAAHM/6yVC-i5lYsA/s320/HomeIndex2708%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;कल&lt;/strong&gt; रात से नींद आखों से गायब है...पूरी रात चैनल बदलने, मुंबई के हालातों की पल-पल की खबर देखनें में बीती। चैनल बदलते हुए बैचेनी बहुत थी। बैचेनी के दो कारण थे एक ये कि आखिर क्यों बार-बार हमारे ही देश को निशाना बनाया जा रहा है? दूसरा यह कि जब मेरे पति, जो इस समय ब्रिटेन के एक अस्पताल में डॉक्टर हैं, मुंबई के हालात टीवी पर देखने के बाद हालचाल जानने के लिए मुझे फोन करते हैं। तब हमारे एक ब्रिटिश दोस्त मुझे संवेदना जताते हुए कहते हैं - &lt;strong&gt;" कम बैक, योर कंट्री इज इन डेंजर...वॉय यू वांट टू लिव इन इंडिया...इट्स नॉट ए प्लेस फॉर लीविंग"&lt;/strong&gt; और हर बार की तरह मैं जॉन को भारत की खासियत गिना नहीं पाईं। उसे भारतदर्शन का न्यौता दे नहीं पाईं।&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मैं निरूत्तर थी, क्योंकि पहले धरती के स्वर्ग को दहलाया जाता था...असम को जलाया जाता था...फिर आई संसद की बारी। उसके बाद तो निर्लज्ज आतंकियों की कुत्सित गतिविधियों से पूरा देश थर्रा गया। कभी मुंबई की लोकल को निशाना बनाया गया तो कभी समझौता एक्सप्रेस को। उसके बाद अजमेर, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली और मुंबई...दिल्ली के कनॉट प्लेस में हुए धमाके बता गए कि अब आतंकवादियों के हौंसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे भारत के उच्च मध्यम वर्ग को निशाना बना सकते हैं। कल मुंबई के ताज पर हुआ हमला अभिजात्य वर्ग पर निशाना था। मानो ये आतंकी अट्टाहास कर रहे हों, बच सकते हो तो बचो तुम अपने देश में कहीं भी महफूज नहीं हो....चाहे गरीब हो या अमीर..देशी हो या विदेशी तुम हमारे निशाने पर हो। अब वक्त है इस अट्टाहास के समूल विनाश का। लेकिन यक्ष प्रश्न है - " क्या हमारी सरकार चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, अब होश में आएँगी।" आज ब्रिटिश क्रिकेट टीम वापस जाने की कवायद कर रही है। मैं किस मुँह से जॉनेथन को कहती कि मैं नहीं तुम अपना बोरिया-बिस्तर बाँधों और भारत चले आओं। मैं तुम्हें अपनी नजरों से अपना हिंदोस्तां दिखाऊँगीं। तरक्की के नए सोपान चढ़ता इंडिया ! जॉन की वाइफ कैथी को इंडिया अपील करता है लेकिन कल वो भी आशंकित नजर आई । ताज के गुंबद को जलता देख स्तब्ध कैथी &lt;strong&gt;" कम बैक डियर"&lt;/strong&gt; बस यही कह पाई।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मैं भारत के दिल मध्यप्रदेश में सुरक्षित हूँ लेकिन खुद से ही पूछ बैठती हूँ कब तक...तब तक ही न जब तक आतंकवादी मेरे शांत मालवा को निशाना नहीं बना लेते। कल जिस तरह एटीएस के जांबाजों को निशाना बनाया गया ...निर्दोषों की मौत का आकड़ा सैकड़ा पार कर गया। क्या उसे देखकर सरकारी तंत्र का सिर शर्म से नहीं झुकता। आखिर क्यों हम इतने नपुंसक हो गए हैं? बार-बार आतंकी हमले झेलने के बाद हमारी सरकारें जिम्मेदारी को गेंद की तरह एक दूसरे के पाले में क्यों फेंकती नजर आती हैं। क्यों नहीं हम उठ खड़े होते ...एक दूसरे से हाथ थामते हुए इस आतंक के दानव का सिर कुचलने के लिए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे याद है जब मैं छोटी थी तब काश्मीर में हल्का सा विस्फोट भी चर्चा का विषय था...लोगों की आँखे नम होती थीं...आज बड़ी सी बड़ी घटना आँखों को नम नहीं करती। हमारे तंत्र की इसी विफलता के कारण आतंकियों का दुस्साहस बढ़ गया है। पहले ये दबे-छिपे विस्फोट करते थे अब खुलेआम मुंबई की आबरू पर हमला करते हैं। एक दो नहीं बल्कि कई जगहों पर बैखोफ आतंकी मशीनगनों और हथगोलों के साथ खुलेआम नरसंहार करते हैं...और अपनों को खोती, छलनी होती बेबस जनता अपने कर्णधार नेताओं की तरफ रूंधे गले और गीली आँखों से टकटकी लगाए देखती रहती हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन अब नहीं, हम आम भारतीय को भी इस बेबसी की खोल से बाहर निकलना होगा। अभी वक्त है यदि हम एक न हुए और एक होकर आतंक के इस दानव का सिर कुचलने के लिए तैयार न हुए तो फिर वक्त हाथ से निकल जाएगा। हम कभी गर्व से नहीं कह पाएँगें कि हम भारत माँ के सपूत हैं...हम भारतीय हैं...मैं आज भी जोनेथन और कैथी में विश्वास जगाना चाहती हूँ कि भारत खूबसूरत है! सुरक्षित है ! यहाँ आओ, मैं तुम्हें गंगा के घाट दिखाऊँगी, रंगीला राजस्थान घुमाऊँगी, आगरा का ताजमहल तुम्हारा इंतजार कर रहा है, ऊँटी के चायबागानों में काम करने वाले भोले-भाले लोगों से मिलवाऊँगीं, मालवा की काली मिट्टी से रूबरू कराऊँगी...हैसियत नहीं है लेकिन बाहर से ही सही अपने वैभव पर इठलाता मुंबई की शान होटल ताज दिखाऊँगी। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाँ मैं उन दोनों को भारत बुलाना चाहती हूँ....लेकिन उन्हें बुलावा देने से पहले हमें समूचे तंत्र को झंझोड़ना होगा। अपने खूफिया तंत्र और नाकारी सरकार को कुंभकर्णी नींद से जगाना होगा। आतंकियों के जेहन में भायवह डर पैदा करना होगा...उन्हें अपने बुलंद इरादों से इतना डराना होगा कि वे फिर हमारे देश की अस्मिता की तरफ सिर उठाकर न देख सकें। जी हाँ अब हमें अपने तंत्र को मजबूर करना होगा, हौसलों को बुलंद करना होगा...और उठ खड़े हो आतंक के इस दानव का सिर कुचलना होगा...आमीन&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-8132654247233707438?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/8132654247233707438/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=8132654247233707438' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/8132654247233707438'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7006991838842216590/posts/default/8132654247233707438'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='आतंक के दानव का सिर कुचल दो'/><author><name>श्रुति अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08361474694332111028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' 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चेहरे से नूर टपकता है। नूर वोटों की ताजी फसल काटने का। न जाने लोकतंत्र को वोटतंत्र बना चुके इन नेताओं के सामने कब तक हम आम जन भेड़तंत्र अपनाते रहेंगे। अब इस भेड़चाल को रोककर आमजनता को जिसमें मैं भी शामिल हूँ आप भी शामिल हैं...हमें वोटो की राजनीति से उबरना होगा। मध्यप्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है। अब देखना यह है कि इस चुनावी दंगल में हम सियासी मोहरा बनते हैं या नहीं। हम इस बार यह समझ पाते हैं या नहीं कि हर बार क्यों चुनाव से पहले ही मजहबी दंगों का तांडव खेला जाता है...&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;object width="320" height="266" class="BLOG_video_class" id="BLOG_video-4a67bb51274a0518" classid="clsid:D27CDB6E-AE6D-11cf-96B8-444553540000" codebase="http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/get_player"&gt;&lt;param name="bgcolor" value="#FFFFFF"&gt;&lt;param name="allowfullscreen" value="true"&gt;&lt;param name="flashvars" 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src='http://1.bp.blogspot.com/_kG76UNf7IjE/SnqVCZCjl0I/AAAAAAAAAPU/A32LPhQguaY/S220/new+photo+2009+275.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7006991838842216590.post-4394521737714730018</id><published>2008-10-13T08:07:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T08:21:44.596-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कसक'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;strong&gt;वीरान बस्ती ..उजाड़ मोहल्ला&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरहानपुर....मध्यप्रदेश का एतिहासिक शहर...एक जरा सी बात पर सियासत और सियासती दाँवपेंचों में झुलसता शहर। टैम सेंटर होने के कारण कई बार नजदीक से देखा था इस शहर को। जब भी यहाँ आती इतिहास का एक नया दस्तावेज हमारी बाट जोहता नजर आता। लेकिन इस बार अब्दुल रहीम खाने खाना की गजब बुद्धि से बने अजब खूनी भंडारे का यह शहर बड़ा वीरान लगा। दंगों ने यहाँ इंसानियत को तार-तार कर दिया। दस लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। एक बस्ती वीरान हो गई। इस बस्ती की हालत...बुरहानपुर में एक रिपोर्टर ने अपनी ड्यूटी तो निभा ली ...खबर कवर करने के बाद बोरियाबिस्तर बाँध लिया, लेकिन यह शहर खासकर गुलाबगंज की वीरान मोहल्ला मन में एक कसक छोड़ गया । आखिर क्यों हम इंसान ही उन्माद में आकर जानवरों से घटिया व्यवहार करने लगते हैं? सुनिए एक बस्ती की ....एक मोहल्ले की दास्तां...जिसे इस बस्ती की वीरान गलियों ने रुँधे स्वर से हमें सुनाया था.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुराहानपुर का गुलाबगंज। एक आबाद मोहल्ला। गरीबों का मोहल्ला। यहाँ 100 से ज्यादा गरीब परिवार हर दुख-सुख में साथ रहते थे लेकिन दस अक्टूबर की रात को हुए एक हंगामें के बाद इस बस्ती की तस्वीर बदल गई। ग्यारह अक्टूबर को कुछ शरारती तत्वों ने पहले मस्जिद से लगी दुकानों में आग लगाई ......फिर क्या था इस आग की चिंगारी में पूरा बुरहानपुर जलने लगा और सबसे ज्यादा कहर टूटा गुलाबगंज में......गुलाबगंज के 20 से ज्यादा घरों में आग लगा दी गई। डर और दहशत के कारण बस्ती का हर इंसान अपना घर छोड़कर कहीं न कहीं पनाह लेने पर मजबूर हो गया। जब हमने इस बस्ती में जाने का फैसला किया तो साथी पत्रकारों से लेकर पुलिस ने सबने हमें वहाँ जाने से रोका। सबको डर था कि गुलाबगंज के लोग कहीं जमा होंगे और हमला बोल देंगे.. लेकिन क्या करूँ हम ठान चुके थे कि हमें दंगों का सच दिखाना है इसलिए जाना ही होगा। रास्ता पूछते-पूछते हम गुलाबगंज में पहुँच ही गए...इस बस्ती के हौलकनाक मंजर ने हमें अंदर तक हिला दिया। बस्ती की वीरानी, जले घर और बचे-कुचे घरों में लटके ताले हमें इंसानों द्वारा इंसानों पर बरपाये कहर की दास्तां सुना रहा थें.. एक कड़वे सच से सामना करा रहे थे। इस मोहल्ले की गलियों में जगह-जगह चप्पले पड़ी थीं...जो गवाही दे रहीं थी कि इस मोहल्ले में रहने वाले कैसे अपने ही जैसे हाड़-माँस के इंसानों से डरकर भागे होंगे। जिस मोहल्ले की और रुख करने से हम घबरा रहे थे उस मोहल्ले की दीवारें तो खुद हर आंगतुक से डर रहीं थीं...शायद उनमें जान होती तो वे भी यहाँ बसने वाले इंसानों की तरह कहीं दूर बहुत दूर भाग चुकी होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने एक जले हुए घर का रुख किया....इस घर की काली पड़ चुकी दीवारें गवाही दें रहीं थी कि यहाँ कभी रौनक हुआ करती थी। यहाँ-वहाँ बिखरे बरतन बता रहे थे कि माँ यहीं बैठकर अपने बच्चों के लिए खाना बनाती होगी। एक जला पंखा गवाही दे रहा था कि वह इस घर में रहने वाले इंसानों को शीतल हवा देता होगा लेकिन आग की तपन के सामने इसकी शीतलता भी फीकी पड़ गई। पक्की दीवारों पर लटकी टीन की छते इस घर के मालिक की आर्थिक स्थिति की चुगली कर रही थी। ना जाने कैसे तिनके जोड़-जोड़ कर इस घर के मालिक ने कैसे अपना आशियाना बसाया होगा। जली अलमारी के अंदर जल चुके कपड़े बता रहे थे कि घर की मुनिया ने ईद-दशहरे पर खरीदी नई कमीज यहीं करीने से तह कर रखी होगी.। घर को छोड़कर भागते हुए कई जोड़ी आँखों ने मुड़-मुड़ कर अपने आशियाने को देखा होगा...अपने सपने को टूटते देखते होगा। इन कई जोड़ी आँखों से नींद अब नदारत होगी...लेकिन क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या किसी इंसान को यह हक है कि वह किसी दूसरे इंसान का आशियाना तबाह कर दें। यह कैसा उन्माद है जिसमें आदमी की आदमियत खत्म हो जाती है। हैवानियत का यह कौन सा जज्बा है, जो मासूम आँखों और नन्हीं गुलाबी हथेलियों के स्पर्श को महसूस नहीं कर पाता। जिसे नादां बच्चों में अपने बच्चे नजर नहीं आते। बूढ़े झुर्रीदार चेहरे से झाँकती आँखों में अपनी माँ नजर नहीं आती....क्या हम खुद अपने आशियाने में आग लगा सकते हैं? क्या हम अपने घर की महिलाओँ को दर-दर भटकने पर मजबूर कर सकते हैं? क्या हम अपने मासूमों को उनकी छत से उनके हक से महरूम कर सकते हैं? नहीं ना ! तो फिर किसने हमें हक दिया कि हम किसी दूसरे का आशियाना तबाह करें, मासूमों को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरहानपुर के दंगों पर अब सियासत शुरू हो चुकी है...लेकिन यह बस्ती, इसका उजाड़ मंजर...जले घुए घरों की दास्तां सुनने का वक्त किसी के पास नहीं हे। दिन बीतते जाएँगें...इस बस्ती के बाशिंदे शायद अपने बसेरों की तरफ लौट आएँगे...लेकिन यकीन मानिए इस हौलकनाक मंजर को महसूस करने के बाद कई जोड़ी आँखे ऐसी होंगी जो अपने मोहल्ले गुलाबगंज में, अपने घर, अपनी छत के नीचे चैन से नहीं सो पाएँगीं....उनकी इस बैचेनी का सबब शायद कोई नहीं समझ पाएँगा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन बीतने के साथ दंगों की आँच फीकी पड़ जाएँगी। पुलिस अपनी ड्यूटी से फारिग हो जाएगी...अपनों को खो चुके लोग अदालत के चक्कर काटते-काटते बेदम हो जाएँगे...और असली दंगाई अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेंकते अपना वोटबैंक बढ़ाते जाएँगे...हर दंगे के बाद यही तो होता है, बुरहानपुर में भी यही हुआ...कल एक नए शहर में एक नई बस्ती होगी...........सियासतदार जिसका हश्र गुलाबगंज की तरह कर देंगे। और एक नया मोहल्ला अपनी बेनूरी पर क्रंदन करेगा...हाँ इतना जरूर है कि वह मोहल्ला रसूखदार अमीरों का नहीं बल्कि रोज कमाने और खाने वाले गरीबो का ही होगा। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7006991838842216590-4394521737714730018?l=kuchankahi-shruti.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kuchankahi-shruti.blogspot.com/feeds/4394521737714730018/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7006991838842216590&amp;postID=4394521737714730018' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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