Monday, December 15, 2008

नारी सिर्फ देह नहीं...


कल रात चैनल सर्फ करते हुए निगाहें कलर्स पर टिक गईं। डॉसिंग क्वीन करके एक और रियलिटी शो आ रहा था...कजिन जिद्द करने लगी। दीदी न्यूज छोड़ों, दिन भर सीरियल चलता रहा...फिर न्यूज अब तो कुछ लाइट देखने दो। पुराने दिनों की तरह कजिन के साथ मस्ती करने लगी....एकाएक मैंटोर का डाँस खत्म हो उनकी स्टूडेंट्स बनने वाली लड़कियों के नाम सामने आना शुरू हुए और यह क्या...पहली बार किसी डॉस शो में बीयरबाला सामने आई....मैरी पुतलियाँ फैलने लगी। बारबाला का स्टेज तक पहुँचना बेहद सुखद लगा...बारबाला बनने के पीछे की मजबूरी ने कोर भिगा दी लेकिन बार बाला से ज्यादा अभिभूत हुई भूमिका से।

सफेद दाग (ल्यूकोडर्मा) से जूझ रही भूमि...जिसे अपनो ने जलाया था...फिर इंजेक्शन के रिएक्शन से आधे शरीर पर सफेद दाग हो गए....भूमि अपनी दास्तां सुना रही थी। दर्शकों को अपने सफेद दाग दिखाने के बाद भूमिका प्रापर मेकअप में सामने आई। पूरे आत्मविश्वास से नृत्य किया...हेमा मालिनी, जीतेंद्र जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ सभी ने खड़े होकर उसका अभिवादन किया।

आज मैं इसी आत्मविश्वासी लड़की के नजरिए से कहना चाहती हूँ नारी सिर्फ देह नहीं....पुरूष किसी भी देश-काल और युग में नारी को उसकी देह से इतर नहीं देखता। भूमिका की बदरंग देह पुरूष को आकर्षित नहीं करती...लेकिन उसका आत्मविश्वास अच्छे-अच्छे पुरूषों का मान हिलाने के लिए काफी है। भूमिका की बदरंग देह में आत्मविश्वास का खूबसूरत रंग भरा है उसकी माँ ने ...जो अपनी बेटी को कहती है वो खूबसूरत है । उसकी आधी फिरंग है और एक बदसूरत लड़की में आत्मविश्वास के बीज बोती रहीं।

अपने आस-पास के माहौल में देखा है लड़की सुंदर है तो माँ-पिता को शादी की चिंता नहीं। पति अपनी खूबसूरत पत्नि पर इतराता है। वहीं नारी अपनी देह की खूबसूरती को गलत नजरों से बचाती नजर आती है। इन विशलेषणों का अर्थ यह है कि आसपास का माहौल ही उसे समझा देता है कि वह लड़की है, एक खूबसूरत शरीर...लेकिन क्या नारी सिर्फ देह है? उसकी आत्मा नहीं। अभी चोखेर बाली पर "मुझे चाँद चाहिए" फिर घूघूती बासूती जी के ब्लाग पर "इन्हें चाँद चाहिए>" पर खासा विचारविमर्श हुआ। पक्ष-विपक्ष में कई बातें रखी गई। यह विषय किसी भी आगे बढ़ रही नारी को झकझोर देता है क्योंकि नारी को देह से इतर देखा नहीं जाता। हर नारी की तरक्की को उसकी देह से जोड़ दिया जाता है। वह पुरूषों से ज्यादा काम करें...चौबीस घंटे सिर्फ काम करती रहे...उस पर तरक्की करे तो भी कहीं खुले स्वरों में तो कहीं दबे छिपे इस तरक्की को देह से जोड़ दिया जाता है।

लेकिन अब हमें सोच के अपने दायरे बदलने होंगे...नारी सिर्फ देह नहीं है। शरीर से इतर उसका दिमाग है, भावनाएँ हैं सबसे बढ़कर कुछ कर दिखाने का माद्दा है। उसके इस माद्दे की इज्जत करनी होगी और सबसे पहले इस सोच को हम स्त्रियों को ही बदलना होगा। अपनी बच्चियों को बताना होगा कि वे कमनीय देह से इतर भी कुछ हैं। नारी सिर्फ देह नहीं है उसका अपना वजूद है, अस्तित्व है। जिसकी उसे इज्जत करनी होगी और दूसरों से करवानी भी होगी।

Saturday, December 6, 2008

मोशे तुमसे मैं क्या कहूँ.......

"मम्मी तुम मुझे छोड़कर क्यों चली गई? प्लीज, जल्दी वापस आ जाओ.........वरना मैं भी तुमकों छोड़कर चला जाऊँगा।"

प्यार, मुनहार और धमकी मिले यह वाक्य मेरे नन्हें उस्ताद के हैं.......मेरे बेटे के। चौथे वसंत में कदम रखने के लिए उतावले हो रहे आयुष के वाक्यांश भी उनकी ही तरह तेजी से बड़े हो रहे हैं। अब उन्हें समझ में आने लगा है कि मम्मी ऑफिस के काम से बाहर जाती हैं और मम्मी का खुद से दूर होना उसे बिलकुल पसंद नहीं...इसलिए वे इस बात को जताने से कभी चूकते नहीं...। जब भी वे मुझे ऐसी धमकी देते हैं मैं उन्हें मनाती हूँ, समझाती हूँ माँ को काम है । बस अभी आती हूँ...चिंता मत करो। देर रात हो जाए तो दिलासा देती हूँ, आँखे बंद करो- जब खोलोगे मैं तुम्हारे सामने रहूँगीं.......लेकिन मोशे मैं तुमसे क्या कहूँ?


आप सोच रहे होंगे मोशे के जिक्र में आयुष की चर्चा क्यों? इसलिए कि पिछले एक हफ्ते से मुझे आयुष में मोशे और मोशे में आयुष नजर आ रहे हैं। अभी कुछ दिन ही तो हुए हैं...रोता हुआ मोशे या हर गम से अनिभिज्ञ मुस्कुराता हुआ मोशे नरीमन हाऊस में घटे हादसे का चेहरा बन चुका है। हर चैनल मोशे के बहाने मुंबई का दर्द दिखा रहा है, उस रात भी चैनलों पर नन्हा मोशे छाया था। मैं आयुष को खाना खिला रही थी कि मोशे की गमगीन मुद्रा को टीवी पर देख आयुष बोल उठा ...मम्मी देखो, बेबी रो रहा है। फिर खुद से ही प्रश्न किया...बेबी क्यों रो रहा है। नादान ने तुरंत प्रतिउत्तर भी दे दिया...इसकी मम्मी ऑफिस गई होगी!

आयुष ने तो नादानी में कह दिया मम्मी ऑफिस गई होगी? शायद मन ही मन तसल्ली भी कर ली होगी कि उसकी मम्मी की ही तरह मोशे की मम्मी भी ऑफिस से वापस आ जाएगी और रोते मोशे को चुपा लेगी लेकिन ..... आज मोशे दर्द का एक चेहरा है " मुस्कुराता चेहरा।" कितनी प्यारी और दिलकश है उसकी मुस्कान लेकिन ये मुस्कुराहट याद दिलाती है हैवानियत को। जिसने एक मासूम से उसके जन्मदिन के दिन ही माँ का साया छीन लिया। मोशे के अंतहीन रुदन के बाद आयुष मुझे मम्मा या मम्मी कहता है तो दिल में कसक उठती हैं। नन्हें मोशे की गुलाबी अंगुलियाँ भी तो माँ का आँचल ढ़ूढती होगीं। अकसर ऑफिस से लौटते हुए आयुष के लिए गुब्बारा या गेंद खरीदती हूँ...हरी, पीली, नीली खासकर लाल। बच्चों को चटख लाल रंग बेहद पसंद है। अफसोस! खून का रंग भी लाल ही होता है। मोशे का पजामा भी अपनो के दर्द से लाल ही हुआ था।
तस्वीरों में मोशे के हाथों में भी गेंद देखी थी, गेंद का नारंगी रंग भी उसके रोते चेहरे के सामने लाल नजर आ रहा था। प्रार्थनाघर में हाथ में गुब्बारा था। हे भगवान! उसका रंग सचमुच लाल ही था...तब से लेकर अब तक आयुष के लिए गुब्बारा या गेंद खरीदने का साहस नहीं जुटा पाई।

मुंबई के हादसे के बाद मेरे अंदर की माँ को अजीब सा डर सताता है। उन भयावह रातों के बाद अब अकसर रात को उठकर आयुष का चेहरा निहारती हूँ। डर लगता है...नींद मैं भी मुझे पहचान जाने वाले आयुष क्या मेरे बिना जी सकेगें। यह कल्पना ही डरा जाती है। मैं एक माँ हूँ , मोशे के लिए कुछ लिखना चाहती हूँ लेकिन कलम और दिमाग साथ छोड़ देते हैं.....आँखे झलक जाती हैं...बस इतना ही कह सकती हूँ कि

"मासूम मोशे तुझे मैं क्या कहूँ? तुझमें मुझे मेरा मासूम दिखता है। जन्नत में बैठी तुम्हारी माँ की आँखों में आसुओं का दरिया होगा। अपनी माँ की आँख के तारे हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया की हर माँ की आँखे नम है। तुम्हारी मासूम मुस्कुराहट के लिए कर रहीं हैं दुआ.....और मुझे विश्वास है कि टीवी पर तुम्हारा कभी रोता कभी मुस्कुराता चेहरा देखकर उस माँ की भी आँखें भीगी होंगी जिसकी कोख से जन्में हैवान ने तुम्हें तुम्हारी माँ से दूर किया है......"
भगवान तुम्हें तुम्हारी महान आया के आँचल में हमेशा यूँ ही मुस्कुराता रखें जैसा तुम मुझे हिंदुस्तान छोड़ते समय टीवी पर दिखाई दिये थे।

आमीन...

Sunday, November 30, 2008

रात अभी बाकी है.....

गहन अंधेरा है
उजास नजर आता नहीं
हर तरफ कुहासा है
क्योंकि रात अभी बाकी है....

ताज पर फिर फहरा गया तिरंगा
लेकिन जमीं पर बिखरा खून अभी बाकी है
शर्मिंदा है जमीर, माँ की नहीं कर पाया रक्षा
हर सिर है झुका क्योंकि रात अभी बाकी है....

उजाले के लग रहे हैं कयास
पर भूलों मत रात अभी बाकी है
गुस्से से भिच रही हैं मुट्ठियाँ
चढ़ रही हैं त्योरियाँ....

बच्चों की मासूम मुस्कुराहट के बीच
माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें बाकी हैं
उठो खड़े हो और लड़ों क्योंकि रात अभी बाकी है
रोशनी की चंद किरणों को समेटों और हुंकार भरो....

माँ के सपूतों उठों, दानवों से लड़ों
रुदन और क्रंदन के बीच कहो
हमने हार नहीं मानी है इसलिए कहते हैं कि
रात अभी बाकी है लेकिन भोर होने वाली है ।

(किसी ने कहा, कानों ने सुना, न जाने क्या हुआ...बस मन किया और की बोर्ड पर अंगुलियाँ चल गईं
और एक कच्ची-पक्की कविता या कहें काफिया लेकिन सच्ची भावनाएँ आकार ले गई। मनोभाव कुछ मासूमों के हैं जिनमें बहुत कांट-छांट करना मुझे गवारा नहीं लगा। )

Saturday, November 29, 2008

एक पाती भईया राज के नाम...

राज ठाकरे जी कदाचित नाराज होंगे....मैंने उन्हें उत्तर भारतियों की तरह भईया जो कह दिया। क्या करूँ, रहती मध्यप्रदेश में हूँ लेकिन दोस्त पूरे देश में फैले हैं...तो भईया राज आप कौन सी कुंभकर्णी नींद में सोए हो। मुंबई जल रही है लेकिन आप नजर नहीं आए। क्यों घर में दुबके रहे। हम इंदौर में रहते हैं। हमारे इंदौर को माँ अहिल्या के नाम से जाना जाता है इसकी पहचान इंदूर के रूप में थी। यदि आप यहाँ होते तो मिनी मुंबई कहलाने वाले इंदौर की तरक्की की जगह इंदौर को इंदूर बनाने में तुले रहते। हमारे धर्मनिरपेक्ष कुटुंब में सासू माँ महाराष्ट्रियन हैं...वे आपसे खासी खफा हैं। वे हमेशा कहती हैं आप देश बाँट रहे हैं...जहाँ चार बर्तन हो खटकते हैं लेकिन बर्तन बाहर फेंक दिए जाएँ तो रसोई कैसे बनेगी। हमारे परिचितों के घर होने वाली महाराष्ट्रियन संगोष्ठी में भी आपको आपकी नीतियों को कोसा जाता है।


कल ऐसी ही एक संगोष्टी हमारे घर में थी जिसमें मुंबई में शहीद सभी देशभक्तों को श्रद्धांजली दी गई। श्रद्धांजली में 85 वर्षीय बुजुर्ग दंपत्ति जिन्हें हम प्यार से आत्या और आतोबा भी शामिल थे। हम तो कुछ ही देर के लिए वहाँ जा सके लेकिन जो देखा-सुना वो आप तक पहुँचा रहे हैं। आतोबा अपने धीमें स्वरों में बड़बड़ा ( आप जैसे नौजवान यही कहेंगे) रहे थे '' अरे, राज ठाकरे कहाँ हैं, उसे नींद से जगाओं। मुंबई से उत्तर भारतियों को निकालने में, बेकसूर छात्रों की पिटाई करने में तो बेहद आगे थे। लेकिन अब जब आमची मुंबई के सम्मान पर हमला किया जा रहा है तब वे कहाँ छिपे हैं। ठीक है, आतंकियों से मुकाबला नहीं कर सकते लेकिन बाहर से ही सही कम से कम सेना के जवानों और कमांडों को भोजन-पानी ही पहुँचा देते। सड़क पर निकलकर मुंबई वासियों को विश्वास ही दिला देते कि मुसीबत के समय में उनका नेता उनके साथ हैं।''


वहीं आत्या आशा मोघे जो खुद रिटायर्ड प्रिसंपल रही हैं ठेठ मराठी में बोली मैं हिंदी मे अनुवाद लिख रही हूँ '' यदि मेरा राज जैसा बेटा होता तो अहिल्या माँ की तरह हाथी के पाँव के नीचे कुचलवा देती। नाकारा आज मुंबई को उसकी जरूरत है। वो ये क्यों भूल रहा है कि आज मुंबई की रक्षा सेना कर रही है। जिसमें हर धर्म के लोग हैं। शहीद होने वाले जाँबाजों में भी हर धर्म के लोग हैं'' , तो भईया राज अब आप बताओं आपके पास हमारे आत्या-आतोबा के सवालों के कुछ जवाब है।


हम तो यहीं कहेंगे कि यह हादसा आपको सबक सिखा जाएँ। आप हमारे भारत को बाँटने का काम छोड़े और अब उत्तरभारतियों नहीं बल्कि आतंकवादियों के खिलाफ मुहिम छेडे़..मानती हूँ आप जैसे राजनीतिज्ञ से उम्मीद ज्यादा कर रही हूँ लेकिन जानती हूँ उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है।