Thursday, November 27, 2008

आतंक के दानव का सिर कुचल दो

कल रात से नींद आखों से गायब है...पूरी रात चैनल बदलने, मुंबई के हालातों की पल-पल की खबर देखनें में बीती। चैनल बदलते हुए बैचेनी बहुत थी। बैचेनी के दो कारण थे एक ये कि आखिर क्यों बार-बार हमारे ही देश को निशाना बनाया जा रहा है? दूसरा यह कि जब मेरे पति, जो इस समय ब्रिटेन के एक अस्पताल में डॉक्टर हैं, मुंबई के हालात टीवी पर देखने के बाद हालचाल जानने के लिए मुझे फोन करते हैं। तब हमारे एक ब्रिटिश दोस्त मुझे संवेदना जताते हुए कहते हैं - " कम बैक, योर कंट्री इज इन डेंजर...वॉय यू वांट टू लिव इन इंडिया...इट्स नॉट ए प्लेस फॉर लीविंग" और हर बार की तरह मैं जॉन को भारत की खासियत गिना नहीं पाईं। उसे भारतदर्शन का न्यौता दे नहीं पाईं।

मैं निरूत्तर थी, क्योंकि पहले धरती के स्वर्ग को दहलाया जाता था...असम को जलाया जाता था...फिर आई संसद की बारी। उसके बाद तो निर्लज्ज आतंकियों की कुत्सित गतिविधियों से पूरा देश थर्रा गया। कभी मुंबई की लोकल को निशाना बनाया गया तो कभी समझौता एक्सप्रेस को। उसके बाद अजमेर, हैदराबाद, अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली और मुंबई...दिल्ली के कनॉट प्लेस में हुए धमाके बता गए कि अब आतंकवादियों के हौंसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे भारत के उच्च मध्यम वर्ग को निशाना बना सकते हैं। कल मुंबई के ताज पर हुआ हमला अभिजात्य वर्ग पर निशाना था। मानो ये आतंकी अट्टाहास कर रहे हों, बच सकते हो तो बचो तुम अपने देश में कहीं भी महफूज नहीं हो....चाहे गरीब हो या अमीर..देशी हो या विदेशी तुम हमारे निशाने पर हो। अब वक्त है इस अट्टाहास के समूल विनाश का। लेकिन यक्ष प्रश्न है - " क्या हमारी सरकार चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की, अब होश में आएँगी।" आज ब्रिटिश क्रिकेट टीम वापस जाने की कवायद कर रही है। मैं किस मुँह से जॉनेथन को कहती कि मैं नहीं तुम अपना बोरिया-बिस्तर बाँधों और भारत चले आओं। मैं तुम्हें अपनी नजरों से अपना हिंदोस्तां दिखाऊँगीं। तरक्की के नए सोपान चढ़ता इंडिया ! जॉन की वाइफ कैथी को इंडिया अपील करता है लेकिन कल वो भी आशंकित नजर आई । ताज के गुंबद को जलता देख स्तब्ध कैथी " कम बैक डियर" बस यही कह पाई।

मैं भारत के दिल मध्यप्रदेश में सुरक्षित हूँ लेकिन खुद से ही पूछ बैठती हूँ कब तक...तब तक ही न जब तक आतंकवादी मेरे शांत मालवा को निशाना नहीं बना लेते। कल जिस तरह एटीएस के जांबाजों को निशाना बनाया गया ...निर्दोषों की मौत का आकड़ा सैकड़ा पार कर गया। क्या उसे देखकर सरकारी तंत्र का सिर शर्म से नहीं झुकता। आखिर क्यों हम इतने नपुंसक हो गए हैं? बार-बार आतंकी हमले झेलने के बाद हमारी सरकारें जिम्मेदारी को गेंद की तरह एक दूसरे के पाले में क्यों फेंकती नजर आती हैं। क्यों नहीं हम उठ खड़े होते ...एक दूसरे से हाथ थामते हुए इस आतंक के दानव का सिर कुचलने के लिए।

मुझे याद है जब मैं छोटी थी तब काश्मीर में हल्का सा विस्फोट भी चर्चा का विषय था...लोगों की आँखे नम होती थीं...आज बड़ी सी बड़ी घटना आँखों को नम नहीं करती। हमारे तंत्र की इसी विफलता के कारण आतंकियों का दुस्साहस बढ़ गया है। पहले ये दबे-छिपे विस्फोट करते थे अब खुलेआम मुंबई की आबरू पर हमला करते हैं। एक दो नहीं बल्कि कई जगहों पर बैखोफ आतंकी मशीनगनों और हथगोलों के साथ खुलेआम नरसंहार करते हैं...और अपनों को खोती, छलनी होती बेबस जनता अपने कर्णधार नेताओं की तरफ रूंधे गले और गीली आँखों से टकटकी लगाए देखती रहती हैं।

लेकिन अब नहीं, हम आम भारतीय को भी इस बेबसी की खोल से बाहर निकलना होगा। अभी वक्त है यदि हम एक न हुए और एक होकर आतंक के इस दानव का सिर कुचलने के लिए तैयार न हुए तो फिर वक्त हाथ से निकल जाएगा। हम कभी गर्व से नहीं कह पाएँगें कि हम भारत माँ के सपूत हैं...हम भारतीय हैं...मैं आज भी जोनेथन और कैथी में विश्वास जगाना चाहती हूँ कि भारत खूबसूरत है! सुरक्षित है ! यहाँ आओ, मैं तुम्हें गंगा के घाट दिखाऊँगी, रंगीला राजस्थान घुमाऊँगी, आगरा का ताजमहल तुम्हारा इंतजार कर रहा है, ऊँटी के चायबागानों में काम करने वाले भोले-भाले लोगों से मिलवाऊँगीं, मालवा की काली मिट्टी से रूबरू कराऊँगी...हैसियत नहीं है लेकिन बाहर से ही सही अपने वैभव पर इठलाता मुंबई की शान होटल ताज दिखाऊँगी।

हाँ मैं उन दोनों को भारत बुलाना चाहती हूँ....लेकिन उन्हें बुलावा देने से पहले हमें समूचे तंत्र को झंझोड़ना होगा। अपने खूफिया तंत्र और नाकारी सरकार को कुंभकर्णी नींद से जगाना होगा। आतंकियों के जेहन में भायवह डर पैदा करना होगा...उन्हें अपने बुलंद इरादों से इतना डराना होगा कि वे फिर हमारे देश की अस्मिता की तरफ सिर उठाकर न देख सकें। जी हाँ अब हमें अपने तंत्र को मजबूर करना होगा, हौसलों को बुलंद करना होगा...और उठ खड़े हो आतंक के इस दानव का सिर कुचलना होगा...आमीन

Wednesday, October 15, 2008

घर कब आओगे

सुनो मेरी दास्तां , समझो सियासी चालें...
दंगे में वीरान हो चुके गुलाबगंज की जो दास्तां आपको सुनाई थी...आज दिखाने जा रही हूँ। हर बार दंगों के बाद ऐसा ही होता है..कुछ मुहल्ले बेनूर होते हैं लेकिन राजनेताओँ के चेहरे से नूर टपकता है। नूर वोटों की ताजी फसल काटने का। न जाने लोकतंत्र को वोटतंत्र बना चुके इन नेताओं के सामने कब तक हम आम जन भेड़तंत्र अपनाते रहेंगे। अब इस भेड़चाल को रोककर आमजनता को जिसमें मैं भी शामिल हूँ आप भी शामिल हैं...हमें वोटो की राजनीति से उबरना होगा। मध्यप्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है। अब देखना यह है कि इस चुनावी दंगल में हम सियासी मोहरा बनते हैं या नहीं। हम इस बार यह समझ पाते हैं या नहीं कि हर बार क्यों चुनाव से पहले ही मजहबी दंगों का तांडव खेला जाता है...

Monday, October 13, 2008


वीरान बस्ती ..उजाड़ मोहल्ला


बुरहानपुर....मध्यप्रदेश का एतिहासिक शहर...एक जरा सी बात पर सियासत और सियासती दाँवपेंचों में झुलसता शहर। टैम सेंटर होने के कारण कई बार नजदीक से देखा था इस शहर को। जब भी यहाँ आती इतिहास का एक नया दस्तावेज हमारी बाट जोहता नजर आता। लेकिन इस बार अब्दुल रहीम खाने खाना की गजब बुद्धि से बने अजब खूनी भंडारे का यह शहर बड़ा वीरान लगा। दंगों ने यहाँ इंसानियत को तार-तार कर दिया। दस लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। एक बस्ती वीरान हो गई। इस बस्ती की हालत...बुरहानपुर में एक रिपोर्टर ने अपनी ड्यूटी तो निभा ली ...खबर कवर करने के बाद बोरियाबिस्तर बाँध लिया, लेकिन यह शहर खासकर गुलाबगंज की वीरान मोहल्ला मन में एक कसक छोड़ गया । आखिर क्यों हम इंसान ही उन्माद में आकर जानवरों से घटिया व्यवहार करने लगते हैं? सुनिए एक बस्ती की ....एक मोहल्ले की दास्तां...जिसे इस बस्ती की वीरान गलियों ने रुँधे स्वर से हमें सुनाया था.....

बुराहानपुर का गुलाबगंज। एक आबाद मोहल्ला। गरीबों का मोहल्ला। यहाँ 100 से ज्यादा गरीब परिवार हर दुख-सुख में साथ रहते थे लेकिन दस अक्टूबर की रात को हुए एक हंगामें के बाद इस बस्ती की तस्वीर बदल गई। ग्यारह अक्टूबर को कुछ शरारती तत्वों ने पहले मस्जिद से लगी दुकानों में आग लगाई ......फिर क्या था इस आग की चिंगारी में पूरा बुरहानपुर जलने लगा और सबसे ज्यादा कहर टूटा गुलाबगंज में......गुलाबगंज के 20 से ज्यादा घरों में आग लगा दी गई। डर और दहशत के कारण बस्ती का हर इंसान अपना घर छोड़कर कहीं न कहीं पनाह लेने पर मजबूर हो गया। जब हमने इस बस्ती में जाने का फैसला किया तो साथी पत्रकारों से लेकर पुलिस ने सबने हमें वहाँ जाने से रोका। सबको डर था कि गुलाबगंज के लोग कहीं जमा होंगे और हमला बोल देंगे.. लेकिन क्या करूँ हम ठान चुके थे कि हमें दंगों का सच दिखाना है इसलिए जाना ही होगा। रास्ता पूछते-पूछते हम गुलाबगंज में पहुँच ही गए...इस बस्ती के हौलकनाक मंजर ने हमें अंदर तक हिला दिया। बस्ती की वीरानी, जले घर और बचे-कुचे घरों में लटके ताले हमें इंसानों द्वारा इंसानों पर बरपाये कहर की दास्तां सुना रहा थें.. एक कड़वे सच से सामना करा रहे थे। इस मोहल्ले की गलियों में जगह-जगह चप्पले पड़ी थीं...जो गवाही दे रहीं थी कि इस मोहल्ले में रहने वाले कैसे अपने ही जैसे हाड़-माँस के इंसानों से डरकर भागे होंगे। जिस मोहल्ले की और रुख करने से हम घबरा रहे थे उस मोहल्ले की दीवारें तो खुद हर आंगतुक से डर रहीं थीं...शायद उनमें जान होती तो वे भी यहाँ बसने वाले इंसानों की तरह कहीं दूर बहुत दूर भाग चुकी होती।

हमने एक जले हुए घर का रुख किया....इस घर की काली पड़ चुकी दीवारें गवाही दें रहीं थी कि यहाँ कभी रौनक हुआ करती थी। यहाँ-वहाँ बिखरे बरतन बता रहे थे कि माँ यहीं बैठकर अपने बच्चों के लिए खाना बनाती होगी। एक जला पंखा गवाही दे रहा था कि वह इस घर में रहने वाले इंसानों को शीतल हवा देता होगा लेकिन आग की तपन के सामने इसकी शीतलता भी फीकी पड़ गई। पक्की दीवारों पर लटकी टीन की छते इस घर के मालिक की आर्थिक स्थिति की चुगली कर रही थी। ना जाने कैसे तिनके जोड़-जोड़ कर इस घर के मालिक ने कैसे अपना आशियाना बसाया होगा। जली अलमारी के अंदर जल चुके कपड़े बता रहे थे कि घर की मुनिया ने ईद-दशहरे पर खरीदी नई कमीज यहीं करीने से तह कर रखी होगी.। घर को छोड़कर भागते हुए कई जोड़ी आँखों ने मुड़-मुड़ कर अपने आशियाने को देखा होगा...अपने सपने को टूटते देखते होगा। इन कई जोड़ी आँखों से नींद अब नदारत होगी...लेकिन क्यों?

क्या किसी इंसान को यह हक है कि वह किसी दूसरे इंसान का आशियाना तबाह कर दें। यह कैसा उन्माद है जिसमें आदमी की आदमियत खत्म हो जाती है। हैवानियत का यह कौन सा जज्बा है, जो मासूम आँखों और नन्हीं गुलाबी हथेलियों के स्पर्श को महसूस नहीं कर पाता। जिसे नादां बच्चों में अपने बच्चे नजर नहीं आते। बूढ़े झुर्रीदार चेहरे से झाँकती आँखों में अपनी माँ नजर नहीं आती....क्या हम खुद अपने आशियाने में आग लगा सकते हैं? क्या हम अपने घर की महिलाओँ को दर-दर भटकने पर मजबूर कर सकते हैं? क्या हम अपने मासूमों को उनकी छत से उनके हक से महरूम कर सकते हैं? नहीं ना ! तो फिर किसने हमें हक दिया कि हम किसी दूसरे का आशियाना तबाह करें, मासूमों को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दें।

बुरहानपुर के दंगों पर अब सियासत शुरू हो चुकी है...लेकिन यह बस्ती, इसका उजाड़ मंजर...जले घुए घरों की दास्तां सुनने का वक्त किसी के पास नहीं हे। दिन बीतते जाएँगें...इस बस्ती के बाशिंदे शायद अपने बसेरों की तरफ लौट आएँगे...लेकिन यकीन मानिए इस हौलकनाक मंजर को महसूस करने के बाद कई जोड़ी आँखे ऐसी होंगी जो अपने मोहल्ले गुलाबगंज में, अपने घर, अपनी छत के नीचे चैन से नहीं सो पाएँगीं....उनकी इस बैचेनी का सबब शायद कोई नहीं समझ पाएँगा....

दिन बीतने के साथ दंगों की आँच फीकी पड़ जाएँगी। पुलिस अपनी ड्यूटी से फारिग हो जाएगी...अपनों को खो चुके लोग अदालत के चक्कर काटते-काटते बेदम हो जाएँगे...और असली दंगाई अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेंकते अपना वोटबैंक बढ़ाते जाएँगे...हर दंगे के बाद यही तो होता है, बुरहानपुर में भी यही हुआ...कल एक नए शहर में एक नई बस्ती होगी...........सियासतदार जिसका हश्र गुलाबगंज की तरह कर देंगे। और एक नया मोहल्ला अपनी बेनूरी पर क्रंदन करेगा...हाँ इतना जरूर है कि वह मोहल्ला रसूखदार अमीरों का नहीं बल्कि रोज कमाने और खाने वाले गरीबो का ही होगा।